Home न्यूज संत गाडगे प्रेक्षागृह में पांच दिवसीय उर्मिल रंग उत्सव प्रारंभ

संत गाडगे प्रेक्षागृह में पांच दिवसीय उर्मिल रंग उत्सव प्रारंभ

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गांधारी के बहाने नारी अस्मिता से जुड़े माकूल जवाब
पहले दिन दर्पण रंगसंस्था द्वारा शंकर शेष के नाटक ‘कोमल गांधार’ का मंचन
लखनऊ, 16 जुलाई। रंगनिर्देशक व्यंग्यकार डा. उर्मिल कुमार थपलियाल के 80वें जन्मदिन पर इनके कृतित्व को व्याख्यायित करता पांच दिवसीय उर्मिल रंग उत्सव आज से संत गाडगेजी महाराज प्रेक्षागृह गोमतीनगर में आज से प्रारंभ हो गया। उत्सव का शुभारंभ वरिष्ठ रंगनिर्देशक सूर्यमोहन कुलश्रेष्ठ ने किया। पहली शाम यहां शंकर शेष के लिखे व डा.थपलियाल द्वारा परिमार्जित आलेख ’कोमल गांधार’ का मंचन रंगसंस्था दर्पण के कलाकारों ने पीयूष पांडे के निर्देशन में मंच पर उतारा। उत्सव 20 जुलाई को डा.उर्मिल की प्रथम पुण्य तिथि पर दर्शनीय प्रस्तुतियों के साथ समाप्त होगा।डा.उर्मिलकुमार थपलियाल फाउंडेशन द्वारा आयोजित इस समारोह के दूसरे दिन 17 जुलाई को ’हे ब्रेख्त’ नाटक का मंचन होगा।
कोमल गांधार की के मूल में गांधारी है जहां डा.थपलियाल ने ’कोमल गांधार का पुनर्पाठ करते समय नाटक के केन्द्रीय पात्र गांधारी के चरित्र की कुछ भिन्न व्याख्या प्रस्तुत करने का प्रयत्न किया और नारी अस्मिता व आधुनिक स्त्री विमर्श के संदर्भ में गांधारी द्वारा अपनी आँखों में पट्टी बाँधने का संकल्प क्या केवल अपने प्रति हुए छल कपट के विरोध में था? क्या यह विरोध खुली आँखों से नहीं हो सकता था? पट्टी बाँधकर क्या गांधारी अपनी ममता दे पाई, अपने पुत्रों को ? खुली आँखों के सामने क्या गांधारी द्रोपदी का चीर हरण चुपचाप देख सकती थीं? क्या अपने प्रति किये गए कौरवी छल के प्रतिरोध ने उसे जड़ और नारी सुलभ ममता से हीन नहीं कर दिया था? जैसे ऐसे कई सवाल हैं, जो हमारे मन मस्तिष्क में उठते हैं। आज दर्शकों को मंचन से इन सवालों के जवाब का एक नया दृष्टिकोण मिला कि गांधारी खुली आँखों से अपने प्रति हुए अन्याय का विरोध करती तो शायद महाभारत न होता, इतिहास में अनर्थ न होता। दुर्योधन और गांधारी के दूसरे पुत्रों को यदि माँ की ममता मिलती तो वे अन्यायी, अहंकारी और निर्मम न होते। उसके सामने कुन्ती स्वयं उदाहरण थी जिसके प्रति भी वही छल हुआ जो गांधारी के साथ हुआ था, किन्तु उसने अपने बच्चों को ममता दी, संस्कार दिये, तभी तो कृष्ण उनके पक्ष में हुए. इतिहास उसके पक्ष में हुआ, अपनी मुक्ति और स्वतंत्रता के लिये स्त्री को खुली आँखों से सतत् संघर्ष करना चाहिये।
प्रस्तुति में मुख्य भूमिकाओं में संजय को सत्येन्द्र कुमार मिश्रा, आत्मा को नसरीन फारुकी, गांधारी को शालिनी विजय, शकुनि को सागर सिंह, धृतराष्ट्र को दीपक दयाल, दुर्योधन को सुमित श्रीवास्तव के साथ अन्य भूमिकाओं को प्रत्यांशी जायसवाल, मुकेश पाण्डेय, प्रखर पाण्डेय, रंजीत सिंह, ओमकार, सुशील व आयुष ने चरित्रानुसार निभाया।
मंच के पीछे सेट बनाने का काम मधुसूदन, प्रकाश परिकल्पना व संचालन का काम गोपाल सिन्हा, ध्वनि संचालन विवेक श्रीवास्तव, वेशभूषा परिकल्प्ना रोजी दुबे, मुखसज्जा मनोज वर्मा व मंच सामग्री सैयद लारेब के हवाले रही। पार्श्वगायन में मुख्य स्वर मीता पंत, अमित दीक्षित, पीयूष पाण्डे, पुष्पेन्द्र सक्सेना व जीएस रावत के रहे। अन्य पक्षों में वीरेन्द्र रस्तोगी, अलका विवेक, करुणा सागर, अनिल मेहरोत्रा, सत्येन्द्र मिश्र व आरएस सोनी आदि का सहयोग रहा। पुर्नपाठ, गीत व संगीत डा.उर्मिलकुमार थपलियाल का था।

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