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संगीत के हर कोने में आज भी छाए हुए हैं मुकेश

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पुण्यतिथि 27 अगस्त पर विशेष —

हेमन्त शुक्ल
बहुआयामी गायकी की छटा बिखेरने वाले मुकेश को हमसे दूर हुए आज 47 वर्ष पूरे हो गए लेकिन उनका स्वर साम्राज्य आज भी सम्पूर्ण विस्तार के साथ दसों दिशाओं में विद्यमान है। खासकर भारतीय फिल्मी संगीत का हर कोना हमें हर क्षण उनकी उपस्थिति का अहसास कराता रहता है।
मुकेश नाम के इस नौजवान गायक ने सहगल का अनुसरण करके उनकी कई शख्सियतों को आत्मसात कर लिया, पर इस सम्पूर्ण प्रक्रिया में ऐसा कहीं भी आभास नहीं हुआ कि वह सहगल की नकल कर रहे हैं। इसीलिए फिल्माकाश में बड़े ही कम समय में लोकप्रियता के शिखर को छू लेने वाले कुछ-एक नामों में एक नाम मुकेश का भी है। पहली बार लोगों को तब पता चला जब इस आवाज में 1945 की फिल्म पहली नजर के अपने गीत …दिल जलता है तो जलने दे, आंसू न बहा फरियाद न कर… के सुरूर से सभी संगीत प्रेमियों को अचम्भित कर दिया। एक हजार से अधिक फिल्मी व गैर फिल्मी गीत गाने वाले मुकेश को शायद दर्द भरे गीतों से विशेष लगाव था जिसे वह अपनी आवाज से व्यक्त करते थे। उन्होंने गमगीन गीतों से अपने सभी सुनने वालों के दिल में आवाज का दीपक ऐसा जला दिया कि जो आजतक चमचमा रहा है । कहना अतिशयोक्ति नहीं होगी कि दर्दीले सुर की गायकी में मुकेश के स्वर का करिश्मा इस कदर प्रभावित था कि उनकी गायकी के पांच दशक बाद भी आज इस क्षेत्र में कोई दूसरा नाम उभर कर सामने नहीं आया। सिर्फ आवाज की ताकत का महत्व कितना है इसे पहली बार मुकेश ने ही अपनी गायकी के जरिए संगीत प्रेमियों को महसूस कराया।
22 जुलाई 1923 को दिल्ली में सुसंस्कृत कायस्थ परिवार में जन्मे मुकेश चंद्र माथुर का बचपन अपने भाई-बहनों के साथ बड़ी ही मस्ती में बीता था। मुकेश की छोटी बहन श्यामा प्यारी ने एक बार बताया था कि मुकेश दा बड़े ही हंसमुख थे, बड़ों की इज्जत करना और हम सभी छोटे भाई-बहनों के साथ सरल व्यवहार के साथ-साथ उनका मजाकिया स्वभाव भी सभी को सदैव प्रसन्न रखता था। उस समय पुरानी दिल्ली के मस्जिद खजूर, चैलपुरी के चक्की वाले मकान में मुकेश का परिवार रहा करता था। इसी मकान में मुकेश का जन्म हुआ था। बाद में जल्द ही यह लोग दिल्ली के गोल बाजार के करीब सरकारी निवास में रहने लगे। निकट ही मंदिर मार्ग स्थित म्युनिसिपल ब्वाएज हायर सेकेंडरी स्कूल में मुकेश का दाखिला करा दिया गया। पढ़ाई में मुकेश सदा अव्वल रहे। मुकेश के सबसे बड़े भाई महावीर चंद ने बताया था कि पढ़ने में मुकेश काफी अच्छा था गाने-बजाने में भी उसका रुझान जरूर था पर इसकी वजह से उसने कभी अपनी पढ़ाई पर कोई फर्क नहीं आने दिया। इसी स्कूल में रोशन लाल भी पढ़ा करते थे जो बाद में संगीतकार रोशन के नाम से मशहूर हुए। मुकेश और रोशन की मित्रता की शुरुआत यहीं से हुई थी जो अन्त तक बरकरार रही। इसी रोशन के पुत्र राकेश रोशन और फिल्म कलाकार निर्देशक और संगीतकार राजेश रोशन के अलावा पुत्र रितिक रोशन भी फिल्म लाइन में ही हैं। वरिष्ठ फ़िल्म फोटोग्राफर अरविन्द सिन्हा के साथ जब राकेश रोशन से साक्षात्कार ले रहा था तो उन्होंने रोशन जी की चर्चा चलने पर बताया था कि स्कूल के कार्यक्रमों में मुकेश जी के गायन के दौरान मेरे पिता रोशन की हारमोनियम जरूर साथ देती थी। भाई महावीर चंद जी के अनुसार हायर सेकेंडरी की परीक्षा प्रथम श्रेणी में उत्तीर्ण करने के बाद मुकेश ने आगे और न पढ़ने की घोषणा कर दी थी। पिता जोरावर चंद ने उन्हें काफी समझाया पर मुकेश ने एक बार जो ना कर दिया तो फिर उसे हां में बदलना बहुत ही मुश्किल होता था। पिता जोरावर चंद की इच्छा थी की मुकेश को रुड़की के इंजीनियरिंग कॉलेज में दाखिला दिलाया जाए क्योंकि वह चाहते थे कि मुकेश इंजीनियर बने पर किस्मत को तो कुछ और ही मंजूर था।
वर्ष 1941 में रंजीत मूवीटोन की फिल्म निर्दोष के नायक-गायक के रूप में प्रवेश करने वाले मुकेश ने इसी वर्ष से अपना परचम लहरा दिया। इसके बाद तो फिल्माकाश में अदाकारी के तीन नक्षत्र राज कपूर, दिलीप कुमार, और देवानन्द की फिल्म आग(1948), मेला(1948) और विद्या(1948) में अपना जादू चलाने वाली यह आवाज इन तीनों के दर्द भरे दृश्यों में एक जरूरत बन गयी और शुरू हुआ दर्द भरी गायकी का एक अंतहीन सिलसिला, जिसके पड़ाव में अनोखी अदा(1948), बरसात(1949), बावरे नैन(1950), संगम(1964), कभी-कभी(1976), मेरा नाम जोकर(1970), पूरब और पश्चिम(1970), संन्यासी(1975) जैसी सैकड़ों फिल्मों के भी अमर गीत आए जिन्होंने मुकेश को वह ऊंचाई दी जो आज उनके निधन के लगभग पांच दशक पूरे होने तक शायद ही किसी दूसरे को मिली हो।
उनकी पहली फिल्म निर्दोष (1941) सफलता के कोई बड़े आयाम तो स्थापित नहीं कर पायी पर इसने सम्भावनाओं की झलक अवश्य दिखला दी। इस फिल्म में उनकी नायिका थीं तब की प्रसिद्ध अभिनेत्री नालिनी जयवंत। बतौर सिने-गायक मुकेश ने अपना पहला गीत- दिल ही बुझा हो तो फसले बहार क्या… इसी फिल्म में गाया था। फिल्म निर्दोष के बाद रंजीत मूवीटोन के साथ मुकेश का दो वर्षों का एग्रीमेंट हो गया था पर आदाब अर्ज(1943) के अलावा इस बैनर तले उनकी बाकी की सभी फिल्में अधूरी ही रह गयीं। 1945 में प्रदर्शित फिल्म मूर्ति का गीत- बदरिया बरस गयी उस पार… ने पहले-पहल मुकेश की लोकप्रियता का पहला सुरीला अध्याय रचा। इस गीत को मुकेश ने बुलो. सी. रानी के संगीत निर्देशन में खुर्शीद और हमीदा बानो के साथ गाया था, पर जिस एक गीत ने मुकेश की लोकप्रियता में चार चांद लगा दिए उसका अपना एक अलग इतिहास ही है। फिल्म पहली नजर(1945) के लिए तब के पहले दर्जे के नायक मोतीलाल ने निर्माता के सामने यह शर्त रख दी कि उनके लिए मुकेश ही गीत गाएंगे। इसी बीच 1943 में मुकेश की दोस्ती हुई मनु भाई त्रिवेदी से। भेंट-मुलाकातों का सिलसिला बढ़ा तो एक दूसरे के घर आने-जाने की राह भी बन गयी। चौपाटी में मनु भाई के घर पर मुकेश की पहचान उनकी बहन बच्ची बहन से हुई पहली नजर में ही प्यार की कोंपल फूटी! इसका अहसास किसी को नहीं हो पाया। दोनों में प्यार की इस पौध ने अपना दायरा बढ़ाना शुरू कर दिया। बम्बई प्रवास के दौरान मैं मारवाड़ी विद्यालय के प्रयोगशाला सहायक की सेवा से अलग होकर प्रबंधक एके शर्मा जी की पेस्ट कंट्रोल कम्पनी में रहते हुए जब नितिन मुकेश के आवास पर पहुंचा था और कुछ लिखने की चाहत में उनकी मां बच्ची बेन से इस प्रेमकथा का जिक्र किया तो उन्होंने बड़े रोचक ढंग से बताया था कि परिवार के विरोध के बावजूद कैसे अभिनेता मोतीलाल और एचएमवी के बीके दुबे शिवमन्दिर में मिले और कान्दीवली के हनुमान मन्दिर ले आए जहां हम दोनों की शादी मुकेश जी के जन्मदिन सोमवार 22 जुलाई 1946 को सम्पन्न हुई। इसके बाद मुकेश ने पंडित जगन्नाथ प्रसाद के यहां शास्त्रीय संगीत सीखना शुरू किया जहां पर राजकपूर से उनकी मित्रता हुई जिसने दोनों का साथ निभाया।
इन्हीं वर्षों में मुकेश को वरिष्ठ संगीतकार अनिल विश्वास ने फिल्म अनोखा प्यार(1948) में लता मंगेशकर के साथ युगल गीत- अब याद न कर भूल जा ऐ दिल… गवाया जो काफी मशहूर हुआ। इसी तरह 40 के दशक से ही संगीतकारों में अग्रणी कहे जाने वाले संगीतकार नौशाद के साथ भी मुकेश के सारे गीत काफी पसंद किए गए। महबूब प्रोडक्शन की फिल्म अनोखी अदा में शायर शकील बदायूनी के गीतों- कभी दिल दिल से टकराता तो होगा… भूलने वाले याद न आ… मंजिल की धुन में झूमते-गाते चले चलो… एवं ये प्यार की बातें ये सफर भूल न जाना… में मुकेश के स्वर का जादू चमत्कारिक ढंग से संगीत प्रेमियों को अपने से बांधने में सफल रहा। इसी तरह नौशाद ने फिल्म मेला(1948) में मुकेश से मधुर स्वर में गाये जा गीत मिलन के… और शमशाद के साथ गीत– मैं भंवरा तूं है फूल… इतना सुमधुर गवाया कि आज तक इसका असर संगीत प्रेमियों पर चढ़ा हुआ है।
दिल से गीत गाने वालों में अपना शुमार रखने वाले दिल्ली से बम्बई पहुंचे इस नायक ने तीन-चार फिल्मों में अभिनय के साथ ही उनका निर्माण भी किया और उनकी असफलता से निराश हुए बिना अपनी गायकी को नया आयाम दिया। गायक मुकेश द्वारा शब्द की प्रकृति पर जोर देकर गाने की विधा ने ही तब के सभी संगीतकारों को विवश किया कि वह उनसे गवाएं। मुकेश की गायकी के 35 वर्षों के सुरों के सफर में अगर देखा जाए तो उनसे सबसे अच्छा काम संगीतकार अनिल विश्वास, नौशाद, रोशन और शंकर जयकिशन ने तो लिया ही साथ में रवि, मदन मोहन, एसएन त्रिपाठी, खय्याम, कल्याणजी आनंदजी, लक्ष्मीकांत प्यारेलाल के अलावा बाद के रविंद्र जैन और राजेश रोशन ने भी उनकी आवाज का सही इस्तेमाल किया।
मुकेश बहुत ही धार्मिक प्रवृत्ति के रहे। सावन के महीने में प्रति सोमवार को मंदिर जाते और भगवान शिव की आराधना करते थे। उनके इसी आध्यात्मिक स्वरूप को देखते हुए उनके पुराने मित्र एचएमवी के बीके दुबे ने मुकेश से गोस्वामी तुलसीदास रचित रामचरितमानस का पूरा संगीतमय पाठ कराया और गायकी के स्वर-सौंदर्य से सजे उनके आध्यात्मिक स्वरूप का दर्शन भी कराया। फिल्म सत्यम् शिवम् सुंदरम् के लिए अपना अंतिम गीत- संगीत की देवी सुर सजनी… रिकॉर्ड कराने के बाद मुकेश बेटे नितिन के साथ कार्यक्रम देने अमेरिका के टोरंटो में अंतिम गीत- जाने कहां गए वो दिन… आधा ही गा पाए थे कि काल के क्रूर हाथ ने आज ही के दिन उनके कंधे पर धीरे से दस्तक दी… इसके बाद तो उनका जनाजा ही स्वदेश लौटा! मुकेश जी हमारे बीच तो नहीं है मगर इसमें कोई दो राय नहीं कि अपने गाए सैकड़ों गीतों के रूप में वह महान गायक आज भी हमारे जीवन में मौजूद है।
इन्हीं यादों की श्रृंखला ने हमें प्रेरित किया और स्वर्गीय मुकेश के सभी चाहने वालों की ओर से आज के दिन उन्हें भावभीनी श्रद्धांजलि !

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