Home न्यूज रेखा, डिंपल के सुरों संग बहीं ईशा-मीशा रतन बहनों की कथक गतियां

रेखा, डिंपल के सुरों संग बहीं ईशा-मीशा रतन बहनों की कथक गतियां

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सैन्य उच्चाधिकारियों के समक्ष सजी शाम ए अवध

लखनऊ, 20 जुलाई। बात अवध और यहां की गंगा जमुनी संस्कृति की हो तो उसमें सूफी कलाम, शास्त्रीय अंदाज भरे सुर, कथक के थाट और नज़ाकत मिल जाए तो क्या कहने!
छावनी के सूर्या प्रेक्षागृह में आज शाम देश भर के सैन्य उच्चाधिकारियों के बीच जफर नबी के संयोजन संचालन में हुनर क्रिएशन क्राफ्ट एसोसिएशन की ओर से ऐसी ही खूबसूरत शाम ए अवध सजी, जिसकी खुशबू दर्शकों के जेहन में लंबे अरसे तक ताज़ा रहेगी।

प्रसिद्ध लेखक रंगकर्मी सलीम आरिफ ने शाम का आगाज गुरु अर्जुन मिश्र और सुरभि सिंह की शिष्याओं रतन सिस्टर्स ईशा-मीशा और साथियों के- ए शहरे लखनऊ तुझे मेरा सलाम…. पर दिलकश समूह कथक नृत्य से की। कार्यक्रम के मध्य इन दोनों जुड़वां बहनों ने अमीर खुसरो के कलाम- छप तिलक सब छीन्ही… पर दशनीय हस्तकाें और पद संचालन में सूफी दर्शन को मंच पर जिया।
इससे पहले लेखक रंगकर्मी सलीम आरिफ ने यहां की तहजीब पर अपनी बात रखी।
अगले जन्मिया में निमियां हो जईतीं और बेटी बचाओ-बेटी पढ़ाओ म्यूजिक एल्बम से चर्चित बिहारी लोक गायिका डिम्पल भूमि ने शुरुआत,- न जी भरके देखा न न कुछ बात की…. से की। फिर गुलाम अली की गाई गजल- दिल में एक लहर सी उठी है अभी…. और फिर जगजीत सिंह की गाई मशहूर गजल- तुमको देखा तो ये खयाल आया… पुरकशिश आवाज में पेश की करते हुए उसमे गीत- होंठों से छू लो तुम बड़ी मुलायमियत से जोड़ कर वाहवाही पाई। इसके बाद गायक कुलतार सिंह के साथ- इसी नजर को तेरा इंतजार आज भी है…. उनके स्वरों में खिला। ‘ऐसे बादल तो फिर भी आयेंगे, लेकिन ऐसी बरसात फिर न होगी’- अशआर कहने के बाद- मेरे रश्के कमर… को डिंपल ने अपनी आवाज दी। फिर सूफी रंगत के कलाम- दमादम मस्त कलंदर सुनाकर सुनने वालों को मस्त कर दिया।
लखनऊ घराने से गुरु बेगम अख्तर की विरासत को संजोने और एक अन्य दिग्गज गायिका बनारस घराने की गिरिजा देवी के मार्गदर्शन में अपने हुनर को निखारने वाली गायिका रेखा सूर्य ने अपनी गायकी के ठहराव भरे अंदाज में शुरुआत खुसरो के कलाम- मोसे नैना मिलाय के…. से स्वरों के बेमिसाल उतार-चढ़ाव के साथ की।
रूमानियत भरे स्वरों से गायन में आध्यात्मिकता घोल देने वाली बेगम अख्तर की सबसे छोटी शिष्या रेखा सूर्या ने गिरिजा देवी की खूबियों को भी अपनी गायिकी में समेटा है। ये बात भी उनकी शास्त्रीयता भरी पेशकश में उजागर हुई।

कबीर की रचना
गायन से पहले, अपने रहस्यमय गीतों और अपनी शैली की अन्य कविताओं को स्पष्ट रूप से समझाकर, वह अनभिज्ञ दर्शकों के लिए हिंदुस्तानी सुगम शास्त्रीय संगीत को उजागर करती है।

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