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“राजभाषा हिंदी” राष्ट्र को एकता के सूत्र में पिरोती है। हिंदी सभी भारतीय भाषाओं की सखी है

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15 सितंबर 1949 को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 से अनुच्छेद 351 के रूप में जो क़ानून बना उसमें हिन्दी को राष्ट्रभाषा नहीं राजभाषा का दर्जा दिया
तभी से 14 सितंबर को हिन्दी दिवस मनाये जाने की शुरुआत हुई
1960 के दशक में ग़ैर-हिन्दी भाषी राज्यों में हुई कई हिंसक झड़पों के बाद देश की संसद ने एक राष्ट्रभाषा के विचार को त्याग दिया
पिछली जनगणना के आंकड़े बताते हैं कि भारत के 43.63 प्रतिशत लोग हिंदी बोलते हैं राष्ट्रभाषा नहीं राजभाषा
बाबा साहब आम्बेडकर की अध्यक्षता वाली समिति में भाषा संबंधी क़ानून बनाने का ज़िम्मा नितांत अलग-अलग भाषाई पृष्ठभूमियों से आए दो विद्वानों को शामिल किया गया था.

एक थे बंबई की सरकार में गृह मंत्री रह चुके कन्हैयालाल माणिकलाल मुंशी जबकि दूसरे तमिलभाषी नरसिम्हा गोपालस्वामी आयंगर इन्डियन सिविल सर्विस में अफ़सर होने के अलावा 1937 से 1943 के दरम्यान जम्मू-कश्मीर के प्रधानमंत्री भी थे.

इनकी अगुआई में भारत की राष्ट्रभाषा को तय किए जाने के मुद्दे पर हिन्दी के पक्ष और विपक्ष में तीन साल तक गहन वाद-विवाद चला.

अंततः मुंशी-आयंगर फ़ॉर्मूला कहे जाने वाले एक समझौते पर मुहर लगी और 14 सितंबर 1949 को भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 से अनुच्छेद 351 के रूप में जो क़ानून बना उसमें हिन्दी को राष्ट्रभाषा नहीं राजभाषा का दर्जा दिया गया. तभी से 14 सितंबर को हिन्दी दिवस मनाये जाने की शुरुआत भी हुई.

अनुच्छेद 343 अपनी शुरुआत में कहता है – “संघ की राजभाषा हिन्दी और लिपि देवनागरी होगी”, उसके आगे और बाद के आठ अनुच्छेदों में बताया गया था हालांकि हिन्दी भारत की राजभाषा होगी, सभी आधिकारिक कार्यों का निष्पादन अंग्रेज़ी में किया जाता रहेगा.

यह व्यवस्था 15 सालों के लिए बनाई गई थी जिसके दौरान यह प्रयास लिए जाने थे कि देश भर में धीरे-धीरे हिंदी को सरकारी कामकाज़ की भाषा बनाए जाने का चरणबद्ध कार्य किया जाएगा. इस अंतरिम समय के बीतने के बाद क्या होगा, उस बारे में कुछ नहीं कहा गया.

इस विषय की जांच करने के लिए भविष्य में एक संसदीय समिति बनाए जाने का फ़ैसला किया गया. इसके अलावा संविधान में 14 अन्य भाषाओं को मान्यता दी गई. पंद्रह सालों के बीत जाने पर भी केन्द्र सरकार के कामकाज़ में हिंदी का काफ़ी कम प्रसार हो सका था.हर दिन हो हिंदी दिवस
वर्तमान समय में जब संचार और कंप्यूटर के क्षेत्रों में हर दिन नए प्रयोग हो रहे हैं और नई शब्दावलियां बन रही हैं. हिन्दी पर और अधिक काम किए जाने की आवश्यकता है. कम्प्यूटर शब्दावली तो छोड़िये, अभी हिन्दी का मानक कीबोर्ड भी नहीं बना है.

हिन्दी में अनेक तरह के फ़ॉन्ट उपलब्ध हैं लेकिन एक से दूसरे में बदलते समय उनमें बहुत गड्डमड्ड हो जाती है. हाल के वर्षों में यूनीकोड फ़ॉन्ट्स पर काफ़ी काम हुआ है लेकिन सरकारी कामकाज़ और प्रकाशन व्यवसाय उनका इस्तेमाल करने में हिचकता दिखाई देता है.

हिन्दी को यूनीकोड में लिखने की सुविधा के चलते एक बड़ा काम यह हुआ कि पिछले आठ-दस सालों में हिन्दी ने इंटरनेट पर अपनी धाकड़ उपस्थिति दर्ज कराई है. युवाओं के बहुत सारे समर्पित संगठन हैं जो इंटरनेट पर लगातार हिन्दी कॉन्टेंट अपलोड कर रहे हैं जिसके कारण अंग्रेज़ी विकीपीडिया के समानांतर हिन्दी विकीपीडिया तैयार हो रहा है.

ट्विटर, फ़ेसबुक, यूट्यूब और व्हाट्सएप जैसे सोशल मीडिया प्लेटफ़ॉर्म्स पर युवाओं में हिन्दी में लिखने, बोलने, सुनने और सुनाने की होड़ लगी हुई है. ध्यान रहे यह वही युवा वर्ग है कुछ समय पहले तक ‘एचएमटी’ कह कर जिसका मज़ाक़ बनाया जाता था.

यह हिंदी का सबसे महत्वपूर्ण संक्रमण काल है जिसमें उसके व्याकरण और भाषिक मूल्यों को तकनीक और विज्ञान की सान पर लगातार परखा और तराशा जा रहा है. इस काम में भी युवाओं ने बागडोर संभाली हुई है.

वे जानते हैं कि आज का संसार यथार्थ और व्यवहार की बुनियाद पर टिका हुआ है और यह भी कि समकालीन संसार के बरअक्स भारत के विकास का सम्बन्ध सीधा-सीधा हिंदी भाषा के विकास से जुड़ा है.

वे यह भी जानते हैं कि उनकी भाषा की उन्नति का प्रश्न सीधे-सीधे आर्थिक-सांस्कृतिक मुद्दों से जुड़ा हुआ है. उन्हें इस बात का इल्म है कि केवल सरकारी प्रचार और नारों से इसे हल नहीं किया जा सकता.

इसके लिए 14 सितम्बर को ही नहीं साल के हर दिन को हिंदी दिवस के रूप में मनाये जाने की दरकार है.

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